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योजनाएं लाते वक्त उसके वित्तीय प्रभाव का भी होना चाहिए आकलन, सुप्रीम कोर्ट बोला- वर्ना सब जुबानी दावे ही रह जाएंगे

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नई दिल्ली, एजेंसी। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक मामले की सुनवाई के दौरान अपनी टिप्पणी में केंद्र सरकार से कहा कि वह बिना मांगे सलाह दे रहा है कि सरकार को योजनाएं और कानून लाते वक्त उसके वित्तीय प्रभाव को भी ध्यान में रखना चाहिए। कोर्ट ने शिक्षा के अधिकार कानून का उदाहरण देते हुए कहा कि कानून बना दिया गया लेकिन स्कूल कहां हैं। शिक्षक कहां से आएंगे। ढांचागत संसाधन नहीं हैं। कुछ जगह शिक्षा मित्र हैं जिन्हें 5,000 रुपये मिलते हैं जो बाद में समानता की मांग करते हैं। जब ऐसे मामले कोर्ट में आते हैं तो सरकार बजट की कमी बताती है।
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा कि आपको इस पहलू को संपूर्णता से देखना चाहिए। सरकार इस दिशा में काम करे अन्यथा यह सिर्फ जुबानी दावे ही रह जाएंगे। ये टिप्पणियां बुधवार को जस्टिस यूयू ललित ने घरेलू हिंसा कानून में बताए गए ढांचागत संसाधन जैसे प्रोटेक्शन अधिकारी की नियुक्ति आदि पूरे देश में उपलब्ध कराने की मांग पर सुनवाई के दौरान कीं। जस्टिस ललित तीन सदस्यीय पीठ की अगुवाई कर रहे थे। पीठ में जस्टिस एस़रविन्द्र भट्ट और जस्टिस पीएस नरसिम्हा भी शामिल थे।
मामला जब बुधवार को सुनवाई पर आया तो कोर्ट ने कहा कि सरकार पहले ब्योरा दे कि घरेलू हिंसा की कितनी घटनाएं होती हैं। इसके बाद तय करे कि प्रत्येक राज्य में कितने कैडर चाहिए। फिर यह देखे कि इस कैडर को बनाए रखने के लिए कितने पैसे की जरूरत होगी। इस पर सरकार की ओर से पेश एडीशनल सालिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि कोर्ट ने गत 25 फरवरी को पिछली सुनवाई पर घरेलू हिंसा कानून के मुताबिक उपलब्ध ढांचागत संसाधनों पर सरकार से स्टेटस रिपोर्ट मांगी थी।
रिपोर्ट का कुछ हिस्सा तैयार है और कुछ सूचनाएं राज्यों से मंगानी हैं। इसके लिए कोर्ट थोड़ा और समय दे दे। सरकार ने इस बाबत अनुरोध पत्र कोर्ट को दिया है। कोर्ट ने सरकार को स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय देते हुए कहा कि रिपोर्ट की एडवांस कापी याचिकाकर्ता को दी जाएगी। कोर्ट ने मामले को 26 अप्रैल को फिर सुनवाई पर लगाने का निर्देश दिया है।
गत 25 फरवरी को कोर्ट ने जिन मुद्दों पर सरकार से ब्योरा मांगा था उनमें घरेलू हिंसा अधिनियम में केंद्रीय योजना और वित्तीय सपोर्ट, घरेलू हिंसा कानून में आने वाली शिकायतों का राज्यवार ब्योरा, अदालतों की संख्या और प्रोटेक्शन अधिकारियों की संख्या बताने को कहा था। इसके अलावा प्रोटेक्शन अधिकारी के रेगुलर कैडर सृजित करने के लिए योग्यता मानदंड, उनके प्रशिक्षण आदि की प्रति को लेकर भी विवरण मांगा है।
यह जनहित याचिका श्वी द वुमेनश् संस्था ने दाखिल की है। जिसमें कहा गया है कि घरेलू हिंसा कानून में बताए गए जरूरी इन्फ्रास्ट्रक्टर और प्रोटेक्शन अधिकारियों की भारी कमी है, इसे दूर किया जाए। कानून को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए ताकि पीडिघ्त महिलाओं की मदद के लिए एक नेटवर्क तैयार हो।

 

 

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