विकासनगर। राजकीय शिक्षक संघ ने साल 2011 तक नियुक्त एलटी शिक्षकों की पदोन्नति में टीईटी (शिक्षक पात्रता परीक्षा) की अनिवार्यता को लेकर शासन से समाधान निकालने की मांग की है। शिक्षकों का कहना है कि टीईटी व्यवस्था उत्तराखंड में वर्ष 2011 से लागू हुई थी। इससे पूर्व नियुक्त एलटी शिक्षकों की नियुक्ति के समय टीईटी की कोई अनिवार्यता नहीं थी। ऐसे में वर्षों बाद नई शर्तों को लागू कर पदोन्नति से जोड़ना निष्पक्षता और संवैधानिक अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं माना जा सकता। राजकीय शिक्षक संघ के पूर्व जिलाध्यक्ष कुलदीप कंडारी ने कहा कि एक आदेश में 2011 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों की पदोन्नति के लिए टीईटी उत्तीर्ण करना अनिवार्य किया गया है, जो कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम के मानक के विपरीत है। नियुक्ति के समय शिक्षक की जो योग्यता अनिवार्य थी, उसे शिक्षक पूरी कराता है। किन्हीं कारणवश सरकार शिक्षकों को टीईटी की अनिवार्यता से विमुक्त नहीं कर सकती है तो कार्यरत शिक्षकों के लिए अलग से विभागीय और अनुकूलित टीईटी परीक्षा आयोजित करनी चाहिए, जिससे शिक्षक पदोन्नति के अवसरों से वंचित न हो सके। हालांकि टीईटी सिर्फ प्राथमिक शिक्षकों के लिए अनिवार्य की गई थी, लिहाजा माध्यमिक शिक्षकों को इस अनिवार्यता से मुक्त रखा जाना चाहिए। राजकीय शिक्षक संघ के कालसी ब्लॉक अध्यक्ष अनिल राणा और चकराता ब्लॉक मंत्री सोहन लाल, कालसी ब्लॉक मंत्री आशीष डबराल, पूर्व ब्लॉक मंत्री हेमंत कठैत ने कहा कि जिन एलटी शिक्षकों की नियुक्ति के समय कला और व्यायाम विषयों के लिए बीएड योग्यता अनिवार्य नहीं थी, उनकी पदोन्नति में भी टीईटी को बाधा नहीं बनने दिया जाना चाहिए।