उत्तराखण्ड की एक 11 किमी. सड़क जिसे बनाने में करोड़ों रूपये हाथ में होने के बावजूद 20 साल में स्वर्णिम चतुर्भुज के शेरशाह, विकास पुरूष और शेरे-ए-गढ़वाल भी हांफ गये

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नागेंद्र उनियाल।
कोटद्वार।
उत्तराखण्ड में 11 किलोमीटर लंबी एक सड़क ऐसी है जिसे बीस साल से करोड़ों रूपये हाथ में होने के बावजूद इसका निर्माण करने में अटल बिहारी वाजपेई मंत्री मंडल में स्वर्णिम चतुर्भुज बनाने वाले तत्कालीन सड़क परिवहन मंत्री भुवन चंद्र खण्डूडी, 1984 से विधायक रहने वाले समर्थकों के द्वारा विकास पुरूष के नाम से पुकारे जाने वाले सुरेंद्र सिंह नेगी और अलग से काम करने वाले उत्तराखण्ड की राजनीति और विकास में उथल पुथल मचाने के कारण समर्थकों द्वारा शेरे-ए-गढ़वाल के नाम से पुकारे जाने वाले हरक सिंह रावत भी हांफ गये है। लेकिन अभी भी यह उम्मीद की जा रही है कि अब कौन सा महायोद्धा आयेगा जो इस मार्ग को बनाने में सफल हो पायेगा। जी यहां बात की जा रही है अंग्रेजों द्वारा वनों को अपनी सरकार के अधीन करने के बाद स्थापित की गई तराई में स्थित कंड़ी रोड के कोटद्वार-चिल्लरखाल-लालढांग वन मोटर मार्ग की। यह मार्ग उत्तराखण्ड राज्य स्थापना के बाद अस्तित्व में आई कंड़ी रोड को यातायात के लिए सुगम बनाने की कवायद शुरू हुई। इन 20 वर्षों में इस कड़ी रोड के लिए कोटद्वार विधानसभा के नेताओं के हाथ में 26 करोड़ रूपये होने के बावजूद इस सड़क का यातायात के लिए निर्माण नहीं हो पाया है।

राज्य स्थापना के बाद कोटद्वार पौड़ी गढ़वाल के आधे हिस्से और गढ़वाल कुमाऊं को जोड़ने वाली कंड़ी रोड के निर्माण की जरूरत पड़ने पर पांच साल बाद सरकार में हरकत शुरू हुई। तो पहली बार इस सड़क निर्माण के लिए 2002 में चुने गये कोटद्वार के तत्कालीन विधायक उनके समर्थकों द्वारा विकास पुरूष के नाम से पुकारे जाने वाले सुरेंद्र सिंह नेगी ने वर्ष 2006-07 में 1 करोड़ 90 लाख स्वीकृत कर उन्हें एक साल में ही खर्च करवा दिया। बावजूद इस सड़क पर खड़िजा तक नहीं बिछा। इसके बाद अटल बिहारी वाजपेई के कार्यकाल में 2004 तक सड़क परिवहन मंत्री व अटल जी के स्वर्णिम चतुर्भुज के सपने को साकार करने वाले भुवन चंद्र खण्डूडी को जब कोटद्वार से चुनाव लड़ने की इच्छा हुई तो उन्होंने वर्ष 2010-11 में 1.88 करोड़ रूपये स्वीकृत कराये, जिसमें से केवल 94 लाख ही खर्च हो पाये। इन 94 लाख में इस 11 किलोमीटर मार्ग पर केवल मिट्टी ही बिछ पाई, जो अगले साल बह गई। कोटद्वार विधानसभा के लिए चुनावी नारा बना यह 11 किलोमीटर मार्ग पर विकास पुरूष सुरेंद्र सिंह नेगी के 2012 में चुनाव जीतने के बाद अगले वर्ष सवा 8 करोड़ रूपये उपलब्ध कराये गये, जिसमें से केवल 21 लाख ही खर्च कर पाये। इसके बाद फिर विकास पुरूष सुरेंद्र सिंह नेगी ने अपने कार्यकाल खत्म होने के समय 4 करोड़ उपलब्ध कराये, यहां पर वे केवल 66 लाख रूपये ही खर्च कर कंडी रोड को जस के तस छोड़कर भगवान भरोसे छोड़ दिया।

स्वर्णिम चतुर्भुज के शेरशाह और विकास पुरूष के कंडी रोड निर्माण में असफल रहने के बाद यहां पर शेरे-ए-गढ़वाल की इंट्री हुई और वे 2017 में कोटद्वार विधानसभा से चुनाव जीते। शेरे-ए-गढ़वाल डॉ. हरक सिंह रावत ने भी कंड़ी रोड के इस 11 किलोमीटर के पार्ट को अपना ड्रीम प्रोजेक्ट बनाकर चुनाव जीतने के अगले वर्ष सर्वाधिक 10 करोड़ रूपये स्वीकृत करवा दिये। लेकिन वे भी इस मार्ग पर केवल 1.88 लाख ही खर्च कर पाये। जिसके तहत इस 11 किलोमीटर के चिल्लरखाल-लालढांग मोटर मार्ग पर स्थित दो स्रोतों पर पुलों का अधूरा निर्माण कर पूरा कराने में हांफ रहे है। लिहाजा अभी भी करोड़ों खर्च होने के बावजूद वन विभाग का लैंसडौन वन प्रभाग इस मार्ग को वन मार्ग की तरह मरम्मत कर यातायात का संचालन कर रहा है।
चिल्लरखाल-लालढांग वन मोटर माग के लिए 14 वर्षों में समय-समय पर 26 करोड़ 20 लाख रूपये शासन से स्वीकृत हुए है, जिसमें से वन मोटर मार्ग पर 6 करोड़ 20 लाख 28 हजार रूपये खर्च हो चुके है, लेकिन अभी तक सड़क नहीं बन पाई है। मोटर मार्ग न बनने से हरिद्वार, ऋषिकेश और देहरादून जाने वाले लोगों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। राज्य बनने के बाद से ही प्रदेश की अस्थाई राजधानी देहरादून को कुमाऊं से जोड़ने के लिए राज्य के अंदर से मोटर मार्ग बनाने की मांग की जा रही है। इसके लिए चिल्लरखाल-लालढांग वन मोटर मार्ग को सबसे उपयुक्त माना गया, लेकिन राज्य बनने के 20 वर्ष बाद भी उक्त मोटर मार्ग नहीं बन पाया। अभी भी कुमाऊं जाने के लिए उत्तर प्रदेश से होकर जाना पड़ता है। राज्य बनने के बाद से ही इस मार्ग को लेकर राजनीति होती रही।
बता दें कि दशकों से बहुचर्चित 11 किलोमीटर चिल्लरखाल-लालढांग वन मोटर मार्ग के लिए वर्ष 2006 से 2020 तक शासन से स्वीकृत हुए 26 करोड़ 20 लाख रुपए, लेकिन सड़क की हालत जस है। चिल्लरखाल-लालढांग वन मोटर मार्ग को गढ़वाल की लाइफ लाइन कहा जाता है और दशको से राजनीति का मुख्य केंद्र बनी हुई है। 

चिल्लरखाल-लालढांग मार्ग बनाने में क्यों हांफ गये सूरमा
कोटद्वार।
कंड़ी रोड का चिल्लरखाल-लालढांग भाग बनाने में उपरोक्त तीनों सूरमा क्यों हांफ गये इसे समझना बहुत जरूरी है। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद कोटद्वार-रामनगर-हल्द्वानी-टनकपुर आदि मार्गों से राजधानी जाने के लिए कंड़ी रोड के सिवाय अपना कोई मार्ग नहीं था। राज्य बनने तक यह मार्ग वन कानूनों के हिसाब से वन मार्ग के रूप इस्तेमाल होता रहता था। जिस पर वन नियमों के तहत सूर्योदय से सूर्याअस्त तक ही आवागमन की अनुमति थी, इसके अलावा मानसून सत्र में इस पर यातायात प्रतिबंधित हो जाता था। राज्य बनने के बाद इस मार्ग की सुध लेनी शुरू हुई तो कॉर्बेट पार्क के बफर जोनों के कारण रामनगर-कालागढ़ मार्ग सामान्य स्थिति में भी वन मार्ग के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं मिली। लेकिन कंड़ी रोड के चिल्लरखाल-लालढांग भाग रिर्जव फारेस्ट के अंदर होने के कारण इस पर वन मार्ग के रूप में यातायात संचालित करने की अनुमति मिल रही थी, लेकिन बरसात में भी यह मार्ग नदी, नालों के कारण अवरूद्ध रहता था, जिससे कुमाऊं और पौड़ी गढ़वाल के कोटद्वार क्षेत्र से राजधानी देहरादून जाने के लिए दूसरे राज्य उत्तर प्रदेश की सीमा से होकर गुजरना पड़ता है।
चिल्लरखाल-लालढांग वन मोटर मार्ग के निर्माण में जहां स्थानीय विधायकों व सरकारों की उपेक्षा रही, जिसका फायदा वन विभाग ने आराम से उठाकर चिल्लरखाल-लालढांग क्षेत्र को राजाजी नेशनल पार्क का बफर जोन घोषित करवा दिया।
वर्ष 2002 में उत्तराखण्ड विधानसभा के लिए पहला चुनाव हुआ। जिसमें कोटद्वार क्षेत्र से विकास पुरूष सुरेंद्र सिंह नेगी विधायक बनें। वे 4 साल तक इस मार्ग के निर्माण के प्रति पूर्ण रूप से उदासीन रहे। अपने कार्यकाल के आखिरी वर्ष में चुनाव को देखते हुए उन्होंने 1.9 करोड़ रूपये स्वीकृत कराये। जो कि खर्च भी हुए पर कहां हुए यह पता नहीं। इसके बाद वे चुनाव हार गये और शैलेंद्र सिंह रावत विधायक बनें तो उन्होंने इस मार्ग पर कोई ध्यान नहीं दिया किन्तु इनके कार्यकाल के दौरान ही जब तत्कालीन मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खण्डूृडी कोटद्वार से चुनाव लड़ने का मन बनाकर यहां के विकास की याद आई तो उन्होंने अपने कार्यकाल में चुनावी वर्ष में 1.88 करोड़ स्वीकृत किये। लेकिन चुनाव हारने के बाद इस पैसे का पूरा उपयोग नहीं हो पाया। फिर सुरेंद्र सिंह नेगी को कोटद्वार की कमान मिली तो उन्होंने अगले वर्ष इसके लिए सवा 8 करोड़ रूपये उपलब्ध करा दिये, इसके बाद फिर विकास पुरूष सुरेंद्र सिंह नेगी ने अपने कार्यकाल खत्म होने के समय 4 करोड़ उपलब्ध कराये, किन्तु इसी दौरान विकास पुरूष सुरेंद्र सिंह नेगी के कार्यकाल के दौरान वर्ष 2014 में चिल्लरखाल-लालढांग मोटर मार्ग का वन क्षेत्र राजाजी टाइगर का बफर जोन घोषित भी करवा दिया। जिससे स्वयं सुरेंद्र सिंह नेगी और वर्तमान विधायक व वन मंत्री इस मार्ग को बनाने में हांफ गये।
लापरवाही कहा हुई यह इस पूरे प्रकरण से समझ में आ जाएगी। यदि विकास पुरूष सुरेंद्र सिंह नेगी और स्वर्णिम चतुर्भुज के शेरशाह भुवन चंद्र खण्डूडी कोटद्वार-लालढांग मोटर मार्ग की भूमि को बफर जोन में शामिल होने से पहले ही लोक निर्माण विभाग को हस्तांतरित कर सकते थे, क्योंकि तब बात राज्य सरकार के हाथ में थी। 2014 में इस मार्ग की भूमि राजाजी नेशनल पार्क के बफर जोन के रूप में शामिल होने पर इसके निर्माण व भूमि हस्तांतरण के लिए केंद्र सरकार के साथ-साथ राष्ट्रीय बाघ प्राधिकरण से भी अनुमति लेने की औपचारिकता बढ़ गई। जिसे वर्तमान वन मंत्री शेरे-ए-गढ़वाल पूरी करने में हांफ रहे है।

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