हिमालय चेतना के अग्रदूत सुंदरलाल बहुगुणा विषय पर हुई परिचर्चा

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पर्यावरणविद के साथ समाज सुधारक भी थे सुंदर लाल बहुगुणा
जयन्त प्रतिनिधि।
श्रीनगर। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग की ओर से ऑन लाइन व्याख्यान का आयोजन किया गया। “हिमालय चेतना के अग्रदूत सुंदरलाल बहुगुणा: एक परिचर्चा” विषय पर आयोजित परिचर्चा में बहुगुणा के जीवन संघर्ष, चिपको आंदोलन, शराब विरोधी आंदोलन, टिहरी बाँध विरोधी आंदोलन और उनकी हिमालयी यात्राओं के विषय मे विस्तृत बातचीत की गई। परिचर्चा में मुख्य वक्ता के रूप में नाबार्ड के पूर्व महाप्रबंधक डॉ. बी.पी.नौटियाल और पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता महिपाल नेगी मौजूद रहे।
पर्यावरण दिवस की पूर्व बेला पर शुक्रवार को आयोजित परिचर्चा में राजनीति विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर एमएम सेमवाल ने कहा कि सुंदरलाल बहुगुणा ने श्रीदेव सुमन से प्रेरणा लेकर अपना सर्वस्व जीवन उत्तराखंड, हिमालय तथा उससे जुड़े लोगो के लिए समर्पित कर दिया। बहुगुणा जी ने टिहरी रियासत के खिलाफ आंदोलन में हिस्सा लिया और स्वतंत्रता के बाद उन्होंने नशाबंदी आंदोलन, चिपको आंदोलन टिहरी बांध विरोधी जैसे कई आंदोलनों में अहम भूमिका निभाई। उनके जीवन काल में उन्हें पद्म विभूषण, शेर ए कश्मीर सहित कई राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। बहुगुणा जी सामाजिक न्याय के क्षेत्र में भी काम किया इसीलिए वह पर्यावरणविद के साथ एक समाज सुधारक भी थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन समाज को समर्पित किया और अपना पूरा जीवन गाँधी जी के सिद्धांतों पर जिया और एक सच्चे सर्वोदयी की तरह सदा जीवन अपनाया। नाबार्ड के पूर्व महाप्रबंधक डॉक्टर बीपी नौटियाल ने बहुगुणा जी को याद करते हुए कहा अपने जीवन की आरंभिक क्षणों में ही वे राष्ट्रीय आंदोलन में सम्मिलित हो गए थे, इसी दौरान टिहरी रियासत के विरुद्ध भी आंदोलन में वे सक्रिय रहे जिसके चलते वे टिहरी रियासत के निशाने पर थे। देश की स्वतंत्रता के पश्चात उन्होंने अपनी पत्नी विमला नौटियाल के कहने पर सक्रिय राजनीति छोड़ दी तथा समाज सुधार के कार्य में लग गए। बहुगुणा जी का पूरा जीवन समाज को समर्पित था और समाज की समस्याओं के समाधान के लिए तत्पर था। जाति की जकड़नों में जकड़े हमारे समाज मे उन्होंने जाति प्रथा के
खिलाफ संघर्ष किया। डॉ. नौटियाल ने 1975 में श्रीनगर से शिमला तक बहुगुणा जी के साथ की गई यात्रा का अनुभव भी साझा किया। बहुगुणा जी के जीवन में यात्राओं का योगदान महत्वपूर्ण रहा है उन्होंने इन यात्राओं के जरिये यहाँ के समाज, भूगोल, पर्यावरण को समझा। उन्होंने केवल विचार नहीं दिए बल्कि उन विचारों का अनुकरण भी किया। परिचर्चा को संबोधित करते हुए मानविकी एवम समाज विज्ञान संकाय के संकायाध्यक्ष प्रोफेसर आरएन गैरोला ने यह कहा कि बहुगुणा जी के जीवन से यह प्रेरणा मिलती है कि किस प्रकार एक सामान्य परिवार में पैदा हुआ बच्चा विश्व स्तर पर ख्याति प्राप्त कर सकता है और इतना संघर्ष वाला जीवन जी
सकता है। उनका चिंतन और विचार जमीनी स्तर से प्राप्त ज्ञान पर आधारित था ना कि केवल किताबी ज्ञान पर। बहुगुणा जी सच्चे रूप में गांधीजी के अनुयायी थे क्योंकि उन्होंने अपने सभी आंदोलन गांधीवादी तरीके से किए हैं इसीलिए उन्हें हिमालय का गांधी कहा जाता है।

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