युग पुरूष पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा, एक जीवट और दार्शनिक जीवन

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पार्थसारथि थपलियाल
विश्वविख्यात पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा का 21 मई को एम्स ऋषिकेश में 94 वर्ष की आयु में निधन हो गया। कोरोना संक्रमण के चलते उन्हें 8 मई को एम्स, ऋषिकेश में उपचार के लिए लाया गया था। जहां स्वास्थ्य में सुधार न होने के बाद उन्होंने अंतिम सांसें ली।
सुंदरलाल बहुगुणा का जन्म 9 जनवरी 1927 को टिहरी गढ़वाल के मरोड़ा गांव में हुआ था। प्राथमिक शिक्षा गांव में प्राप्त करने के बाद वे लहर चले गए थे जहाँ उन्होंने स्नातक स्तर की पढ़ाई पूरी की और गांधीवाद को अपने जीवन में ढालने लगे, दलितवर्ग के उत्थान में उनकी रुचि रही, दलितों का मंदिर में प्रवेश के लिए वे युवावस्था से ही कार्यशील थे। सर्वोदयी कार्यकर्ता मानसिंह रावत के साथ बहुगुणा जी ने गढ़वाल में शराब के प्रति बढ़ती प्रवृति के विरुद्ध गांव-गांव जाकर अलख जगाई। गढ़वाल में शराब को बढ़ावा देने के खिलाफ 1971 में उन्होंने 16 दिनों तक सघन आंदोलन चलाया। गांव-गांव और स्कूल-स्कूल जाकर उन्होंने शराब के प्रचलन के विरुद्ध भाषण दिए, प्रचार सामग्री वितरित की। बहुगुणा जी ने टिहरी में नवजीवन मंडल की स्थापना की और समाज में व्याप्त बुराइयों के खिलाफ जन जागरण पैदा करने लगे। नवजीवन आश्रम सिल्यारा पर्यावरण की तपस्थली बन गया था। उन दिनों उत्तर प्रदेश सरकार अपनी नीति के तहत पहाड़ों में पेड़ काटने के ठेके देती थी। उस समय तक गढ़वाल के जंगल पहले जैसे नहीं रह गए थे। 1970 में सुंदरलाल बहुगुणा, कॉमरेड गोविंद सिंह रावत, चंडी प्रसाद भट्ट, और रेणी गांव की गौरा देवी ने सरकार की इस नीति के विरुद्ध एकजुट होकर आंदोलन करने की योजना बनाई। ठेकेदार द्वारा 2400 पेड़ काटे जाने थे। जब ठेकेदार के श्रमिक पेड़ों को काटने जंगल मे पहुंचे तो गौरा देवी सहित 27 महिलाएं पेड़ों से चिपक गई। उन्होंने कहा पेड़ों को काटने से पहले हमें काटो लो। हम अपने जंगलों को कटने नहीं देंगे। बाद में उनके साथ कई अन्य पर्यावरण रक्षक भी जुड़ गए। इस आंदोलन को चिपको आंदोलन नाम से प्रसिद्धि मिली। आंदोलन ने सरकार को नीति बदलने के लिए मजबूर कर दिया। 1980 में बहुगुणा जी को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मिलने के लिए बुलाया। श्रीमती गांधी ने उत्तराखंड के पहाड़ के जंगलों को 15 वर्ष तक काटने पर प्रतिबंध लगा दिया। इस आंदोलन के फलस्वरूप भारत में अलग पर्यावरण मंत्रालय बना। 1980 में वन संरक्षण अधिनियम बनाया गया। सुंदरलाल बहुगुणा पर्यावरण के पर्याय बन गए। देश विदेश में उनके विचार पर गहन चिंतन शुरू हुआ। उन्होंने अपनी बात को धार देने के लिए नारा दिया- क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार, मिट्टी पानी और बयार, जिंदा रहने के आधार।
सुंदरलाल बहुगुणा हिमालयी पर्यावरण के प्रति सरकारों को आजीवन जागरूक करते रहे। उन्होंने 1981 से 83 के मध्य हिमालय की एक छोर से दूसरी छोर तक 5000 किलोमीटर की पैदल यात्रा की। उनका दैनिक खर्च औसतन एक रुपया पैंतीस पैसा था। जीवन गांधी जी जैसा सादगी भरा। बहुगुणा जी पहाड़ों में कटान कार्यों के विरुद्ध रहे उनका कहना था कि हिमालयी पर्वत बहुत पक्के नही हैं निर्माण कार्यों से तापमान बढ़ेगा, ग्लेशियर पिघलेंगे, बाढ़ आएगी, धीरे-धीरे एक सभ्यता का अंत हो जाएगा। यहाँ तक कि टिहरी बांध निर्माण के विरुद्ध उन्होंने एक बार 44 दिन और दूसरी बार 74 दिनों की भूख हड़ताल भी की। पर्यावरण के इस महान प्रेमी को अनेक पुरस्कार/सम्मान प्राप्त हुए। सुंदरलाल बाहुगुणा को 1986 में जमुनालाल बजाज पुरस्कार, 1987 में राइट लवली हुड अवार्ड (अमेरिका), 1981 में पदमश्री व 2009 में पद्मविभूषण पुरस्कार प्रमुख हैं। पर्यावरण के प्रति उनकी चेतना लोगों की समझ में अब आने लगी है जब दुनिया में मौसम परिवर्तन, ऋतु परिवर्तन, पारिस्थितिकी परिवर्तन से मानवता को बचाने के उपायों पर अनुसंधान और नीतियां बनायी जा रही हैं। आज जब वे दुनिया छोड़ चुके हैं तब 1969 में छात्र जीवन से लेकर प्रसारण की दुनिया तक उनके साथ की अनेक मुलाकातें याद आ रही हैं। आने वाली पीढियां विश्वभर में पर्यावरण संरक्षण के इस महामानव को दिल से याद करेंगी जिन्होंने सांस लेने के लिए पर्यावरण को अपना अमोघ अस्त्र बनाया।। शत शत नमन।।

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