जयन्त प्रतिनिधि।
कोटद्वार : दुगड्डा विकासखंड का पुलिंडा गांव पिछले करीब 55 वर्षों से भूस्खलन की मार झेल रहा है, लेकिन आज तक इसके विस्थापन की योजना धरातल पर नहीं उतर सकी। सरकारी स्तर पर कई बार सर्वे हुए, घोषणाएं हुईं और वैकल्पिक स्थान भी चिह्नित किए गए, लेकिन वन कानूनों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के बीच मामला उलझकर रह गया। नतीजतन हर मानसून में ग्रामीण दहशत के साए में जीवन बिताने को मजबूर हैं।
वर्ष 1971 में पहली बार गांव बड़े भूस्खलन की चपेट में आया था। उस समय करीब 12 मकान जमींदोज हो गए थे, कई अन्य मकानों में दरारें आ गई थीं और गोशालाओं के ध्वस्त होने से पशुधन का भी नुकसान हुआ था। इसके बाद ग्रामीणों ने अपेक्षाकृत सुरक्षित स्थानों पर नए मकान बनाए, लेकिन भूस्खलन का खतरा आज भी पूरी तरह टला नहीं है। बरसात शुरू होते ही कई परिवार एहतियातन अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर चले जाते हैं। कभी डेढ़ सौ से अधिक परिवारों वाला पुलिंडा गांव अब पलायन के कारण सिमटकर 20 से 25 परिवारों तक रह गया है। ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से वे स्थायी समाधान की मांग कर रहे हैं, लेकिन हर बार उन्हें सिर्फ आश्वासन ही मिला है।
वन भूमि बनी सबसे बड़ी बाधा
पुलिंडा के विस्थापन की कवायद वर्ष 1996 में शुरू हुई थी, जब भू-वैज्ञानिकों ने गांव को असुरक्षित मानते हुए अन्यत्र बसाने की संस्तुति की थी। वर्ष 2006 में तत्कालीन मुख्यमंत्री के निर्देश पर गांव को लैंसडौन वन प्रभाग के पापीडांडा खाम में बसाने का प्रस्ताव तैयार हुआ और वन भूमि हस्तांतरण की प्रक्रिया भी शुरू की गई, लेकिन आरक्षित वन क्षेत्र होने के कारण योजना आगे नहीं बढ़ सकी। इसके बाद अगस्त 2021 में भू-वैज्ञानिकों ने दोबारा सर्वे कर रिपोर्ट प्रशासन को सौंपी। इस सर्वे में पूरे गांव के बजाय केवल पांच परिवारों को अत्यधिक खतरे की जद में माना गया और उनके विस्थापन की संस्तुति की गई। हालांकि, पांच वर्ष बीतने के बाद भी इन परिवारों का पुनर्वास नहीं हो सका है।