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एमसीडी बिल पर सियासत गर्म, केजरीवाल और मोदी सरकार आमने-सामने

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नई दिल्ली, एजेंसी। दिल्ली नगर निगम को लेकर एक बार फिर केंद्र और केजरीवाल सरकार आमने-सामने हैं। दरअसल, केद्र सरकार ने संसद में दिल्ली के तीनों निगमों को एक करने वाला विधेयक पेश किया है। इसको लेकर दिल्ली में सियासत गरमा गई है। केंद्र द्वारा पेश इस विधेयक में यह बताया गया है कि तीनों निगमों को एक करने से क्घ्या लाभ होगा? केंद्र ने यह बताया है कि तीनों निगमों को एक करना क्यों जरूरी है? केंद्र के इस विधेयक का दिल्घ्ली की केजरीवाल सरकार विरोध कर रही है। उधर, केजरीवाल सरकार का यह तर्क है कि तीनों निगमों का एकीकरण केवल एक बहाना है इसके जरिए केंद्र निगम चुनाव को टालना चाहती है। केजरीवाल का आरोप है कि केंद्र सरकार निगम को अपने अधीन करना चाहती है।
केंद्र सरकार ने कहा दिल्घ्ली के तीनों निगमों को एक करना जरूरी है। सरकार का दावा है कि इससे निगम की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। इसके अलावा संसद में पेश किए गए विधेयक में कई अहम बदलावों की बात की गई है। यह विधेयक केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने लोकसभा में पेश किया है। इसमें घरों में सफाई करने वाले कर्मचारियों को 14 दिनों के नोटिस देकर हटाने का जो प्रावधान है उसे खत्म कर सभी सफाई कर्मचारियों को पक्का किए जाने की बात कही है।
एकीत नगर निगम को पहले से अधिक वित्तीय अधिकार मिलेंगे। इससे तीन नगर निगमों के कामकाज को लेकर व्यय एवं खर्च की देनदारियां कम होंगी। भाजपा का कहना है कि तीनों निगमों को अब सीधे केंद्र सरकार से फंड मिलेगा और शहर का विकास होगा। इस संशोधन बिल के तहत 1957 के मूल अधिनियम में भी कुछ और संशोधनों को मंजूरी दी गई है। इससे पारदर्शिता, बेहतर प्रशासन और दिल्ली के लोगों के लिए प्रभावी सेवाओं को लेकर ठोस आपूर्ति ढांचा सुनिश्चित किया जा सकेगा।
निरंजन साहू (ओआरएफ के गवर्नेंस एंड पालिटिक्स इनिशिएटिव के वरिष्ठ फेलो) का मानना है कि तीनों निगम को एक करने के प्रस्ताव को कैबिनेट द्वारा पास किए जाने का दूरगामी परिणाम दिखाई देगा। इस फैसले से देश की राजधानी एक आदर्श दिल्ली के रूप में पूरे विश्व में जानी जाएगी। साथ ही फंड के अभाव में दिल्ली नगर निगम की योजनाएं अब दम नहीं तोड़ेंगी। दिल्ली के लोगों को अच्छी सुविधा मिलेंगी। अब दिल्ली सरकार नगर निगम का फंड रोक नहीं पाएगी।
दिल्ली सरकार इसका लगातार विरोध कर रही है। दिल्ली सरकार का दावा है कि केंद्र सरकार केवल नगर निगम चुनावों को टालने के लिए इस तरीके के विधेयक लेकर आ रही है। आम आदमी पार्टी का कहना है कि इससे यह साफ है कि हो सकता है कि आने वाले समय में एमसीडी को केंद्र सरकार चलाएगी। मौजूदा समय में जहां तीनों निगमों को मिलाकर कुल 272 वार्ड हैं, उन्हें घटाकर 250 के जाने की बात कही गई है। दिल्ली सरकार का कहना है कि इसका अर्थ परिसीमन है, यानी कि कोई चुनाव नहीं होंगे और केंद्र सरकार निगम को अपने अधीन ले लेगी। यह संविधान के खिलाफ है और अगर इसको लेकर जरूरत पड़ती है तो दिल्ली सरकार अदालत का दरवाजा खटखटाएगी।
गौरतलब है कि वर्ष 2011 में दिल्घ्ली सरकार ने एमसीडी एक्घ्ट में संशोधन कर निगम को तीन भागों में बांट दिया था। इससे दक्षिण दिल्घ्ली नगर निगम, पूर्वी दिल्घ्ली नगर निगम और उत्घ्तरी दिल्घ्ली नगर निगम किया गया था। वर्ष 2011 में दिल्ली सरकार ने एमसीडी एक्ट-1957 में संशोधन कर निगम की सभी शक्तियां अपने पास रखी थी। इसमें वार्ड का निर्धारण, वार्ड रिजर्वेशन, जोन का विभाजन, कर्मचारियों का वेतन और भत्तों का निर्धारण, म्युनिसिपल फंड में गड़बड़ी पर कार्रवाई का अधिकार ये सभी शक्तियां दिल्ली सरकार के पास थी, लेकिन यदि तीनों निगम को एक कर दिया जाएगा तो ये सभी शक्तियां एमसीडी कमिश्नर के पास होंगी।

 

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