उत्तराखंड

भवसागर की वैतरणी है श्रीमद् भागवत कथा-महंत अरूणदास-

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हरिद्वार। श्री जगन्नाथ धाम आश्रम के अध्यक्ष महंत अरुणदास महाराज ने कहा है कि श्रीमद् भागवत कथा भवसागर की वैतरणी है। जो व्यक्ति के मन से मृत्यु का भय मिटा कर उसके कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है। जो श्रद्घालु भक्त कथा का श्रवण कर लेते हैं। उनका जीवन भवसागर से पार हो जाता है। भीमगोड़ा स्थित आश्रम में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के विश्राम अवसर पर श्रद्घालु भक्तों को संबोधित करते हुए महंत अरुणदास महाराज ने कहा कि श्रीमद् भागवत कथा पतित पावनी मां गंगा की भांति बहने वाली ज्ञान की अविरल धारा है। जिसे जितना ग्रहण करो उतनी ही जिज्ञासा बढ़ती है और प्रत्येक सत्संग से अतिरिक्त ज्ञान की प्राप्ति होती है। उन्होंने कहा कि भागवत कथा कल्पवृक्ष के समान है। जिससे सभी इच्छाओं की पूर्ति की जा सकती है। सोया हुआ ज्ञान वैराग्य कथा श्रवण मात्र से जागृत हो जाता है और व्यक्ति में उत्तम चरित्र का निर्माण होता है। कथा व्यास पंडित बालक दास महाराज ने कहा कि श्रीमद् भागवत कथा व्यक्ति के मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है और गंगा तट पर इसका महत्व और अधिक बढ़ जाता है। हरिद्वार देवभूमि उत्तराखंड में कथा सुनने का अवसर सौभाग्यशाली व्यक्ति को ही प्राप्त होता है। वास्तव में श्रीमद् भागवत कथा देवताओं को भी दुर्लभ है। कथा श्रवण से राजा परीक्षित को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी और कलयुग में भी उसके साक्षात प्रमाण देखने को मिलते हैं। इसीलिए सभी को समय निकालकर कथा का श्रवण अवश्य करना चाहिए। महंत लोकेश दास महाराज ने कहा कि कथा का श्रवण और पठन दोनों ही सर्वदा हितकारी है। कथा श्रवण करने वाले श्रोताओं का सौभाग्य है कि गंगा का पवित्र तट उन्हें प्राप्त हुआ है। श्रीमद् भागवत कथा में सभी ग्रंथों का सार निहित है और इसका श्रवण सर्वदा कल्याणकारी और हितकारी है। इसलिए साक्षात भगवान श्रीष्ण की वाणी को सभी को अपने जीवन और व्यवहार में उतार कर सत्य कर्म करने चाहिए और सर्वदा मानव सेवा के लिए समर्पित रहना चाहिए। यही जीवन का सारांश है। कथा में पधारे सभी संत महापुरुषों का श्रीष्ण गोपाल शेट्टी, श्रीप्रकाश, ओमप्रकाश बंगा, बृजलाल टुटेजा, अशोक लूथरा, दीपक चावला, सुमित चावला, निखिल चावला, सुरेश करतार, पंडित जगदीश चंद्र पांडे, मास्टर राम नारायण ने फूल माला पहनाकर स्वागत किया। इस अवसर पर महंत गुरमेल सिंह, महंत सूरजदास, महंत शिवानंद आदि मौजूद रहे।

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