कोलकाता,पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को बड़ा झटका लगा है। भाजपा ने 206 सीटें जीतकर 15 साल के टीएमसी शासन को खत्म कर दिया है। नतीजों के बाद एंटी इनकम्बेंसी और भाजपा के चुनावी प्रबंधन समेत तमाम वजहों की चर्चा हो रही है। हालांकि, आंकड़े इशारा कर रहे हैं कि चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) ने भी ममता की हार में भूमिका निभाई है।चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, भाजपा को 45.84 प्रतिशत और टीएमसी को 40.80 प्रतिशत वोट मिले हैं। यानी भाजपा केवल 4 प्रतिशत अंक आगे है। वोटों के लिहाज से देखा जाए तो भाजपा को करीब 2.92 करोड़ और टीएमसी को 2.60 करोड़ वोट मिले हैं। यानी वोटों में अंतर करीब 32 लाख का है। सीटों की बात करें तो भाजपा को 206 सीटें मिली हैं और टीएमसी को 80। यानी 126 का अंतर।
पश्चिम बंगाल में एसआईआर के बाद मतदाता सूची से 91 लाख नाम हटाए गए थे। पहले चरण में 64 लाख और फिर तार्किक विसंगति के नाम पर 27 लाख। इसके बाद कुल मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 6.75 करोड़ रह गई थी। इनमें लगभग 27 लाख लोग ऐसे हैं, जिनके मामले अभी भी न्यायाधिकरणों में लंबित हैं। इन लोगों ने पहले मतदान किया था, लेकिन इस चुनावों में इन्हें वोट डालने की अनुमति नहीं दी गई।
रिपोर्ट के मुताबिक, जिन सीटों पर 5,000 से कम वोट डिलीट हुए हैं, वहां की 13 में से 12 सीटें भाजपा ने जीती हैं। इसी तरह जहां 5,000 से 15,000 वोट कटे हैं, वहां की 64 में से भाजपा ने 46, जहां 15,000 से 25,000 वोट कटे हैं, वहां की 69 में से भाजपा ने 44 और जहां 25,000 से ज्यादा वोट कटे हैं, वहां की 147 में से 88 सीटें भाजपा ने जीती हैं।
राजनीतिक विश्लेषक आशुतोष वार्ष्णेय ने कहा, भाजपा की जीत में एक भूमिका एसआईआर से मुस्लिम मतदाताओं की घटी संख्या भी है। यह केवल व्यावहारिक राजनीति का मामला नहीं है, बल्कि दुनिया में लोकतंत्र पर होने वाली बहसों का हिस्सा बनने वाला है।
रिपोर्ट के मुताबिक हटाए गए नामों में 57.47 लाख हिंदू (63 प्रतिशत) और 31.1 लाख मुस्लिम (34 प्रतिशत) हैं। 2011 की जनगणना के मुताबिक, राज्य में मुस्लिम आबादी 27 प्रतिशत है।