एसआईआर के दौरान मतदाता सूची से नाम कटने पर नहीं जाएगी नागरिकता, सुप्रीम कोर्ट ने कहा

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नईदिल्ली, सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को चुनाव आयोग की ओर से कराए जा रहे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की वैधता पर फैसला देते हुए नागरिकता की चिंताओं पर भी बड़ा बयान दिया। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि एसआईआर की प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची से नामों को हटाना नागरिकता का निर्धारण नहीं करता है। पीठ ने कहा कि आयोग सीमित उद्देश्य से नागरिकता की जांच कर सकता है।
क्या चुनाव आयोग किसी व्यक्ति की नागरिकता का निर्धारण कर सकता है? इस व्यापक सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी चिंता का निवारण किया। उसने कहा कि आयोग नागरिकता जांच सकता है, लेकिन सिर्फ संबंधित व्यक्ति को मतदाता सूची में शामिल करने या बाहर करने के सीमित दृष्टिकोण से। कोर्ट ने कहा कि आयोग नाम हटा सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह व्यक्ति भारत का नागरिक नहीं रह गया, इसका नागरिकता निर्धारण से कोई लेना-देना नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि आयोग को नागरिकता के आधार पर मतदाता सूची से हटाए गए व्यक्तियों को 4 सप्ताह में केंद्र के सक्षम प्राधिकारी के पास भेजना होगा। कोर्ट ने कहा, आयोग का फैसला, चुनावी उद्देश्यों तक सीमित है। वह नागरिकता के प्रश्न पर अंतिम फैसला नहीं ले सकता। यह फैसला सक्षम प्राधिकारी के अधीन रहेगा। सक्षम प्राधिकारी कानून के अनुसार कदम उठाएगा और नोटिस जारी कर सुनवाई करेगा। उसके फैसले पर व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में जोड़ा-हटाया जाएगा।
दरअसल, एसआईआर की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं में उन मतदाताओं का भी जिक्र है, जिनके नाम 2002-2003 की मतदाता सूची में नहीं थे और उस सूची में मौजूद व्यक्ति से मतदाता को अपने पैतृक संबंध स्थापित करना जरूरी था। ऐसे में मतदाताओं की नागरिकता को लेकर सवाल उठने लगे और उनको संबंधित दस्तावेज पेश करने को कहा गया। हालांकि, याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि एसआईआर से आयोग को नागरिकता का निर्धारण करने का अधिकार नहीं है।
कोर्ट ने बिहार में नागरिकता के आधार पर मतदाता सूची से हटाए गए लोगों को 4 सप्ताह में सक्षम प्राधिकारी के पास भेजने को कहा है। प्राधिकारी विधानसभा-निकाय चुनाव से पहले प्रक्रिया पूरी करेगा। अनुपस्थिति के आधार पर हटे नागरिक भी अपील कर सकते हैं।

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