विभिन्न देशों से आये साधकों ने योग की विधाएं जानी

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ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन में शनिवार को पांच दिवसीय योगा टीचर ट्रेनिंग कोर्स का समापन हुआ। इस दौरान योग जिज्ञासुओं ने योग की विभिन्न साधनाओं, विधाओं को आत्मसात किया। स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि योग भारत की प्राचीनतम ज्ञान परंपरा है। यह केवल शरीर को मोड़ने की क्रिया नहीं, बल्कि जीवन को जोड़ने की कला है। हजारों वर्षों पूर्व भारत के ऋषियों ने ध्यान, प्राणायाम, संयम, अनुशासन और आंतरिक शांति के माध्यम से जो दिव्य विज्ञान खोजा, वही आज संपूर्ण विश्व के लिए आशा का प्रकाश बन चुका है। कहा कि जब विश्व तनाव, अवसाद, असंतुलन, हिंसा और अशांति जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है, तब भारत की यह अमूल्य देन योग मानवता को नया मार्ग दिखा रही है। योग सिखाता है कि बाहर की जीत से पहले भीतर की शांति आवश्यक है; संसार को बदलने से पहले स्वयं को संतुलित करना जरूरी है। इससे पहले परमार्थ निकेतन में आयोजित योग टीचर ट्रेनिंग कोर्स के माध्यम से योगाचार्यों ने प्रतिभागियों को आसन, प्राणायाम, ध्यान, योग दर्शन, आयुर्वेदिक जीवनशैली, मंत्रोच्चारण, सत्संग, गंगा आरती और सेवा जैसे विविध आयामों से परिचित कराया। योगाचार्य साध्वी आभा सरस्वती ने प्रतिभागियों से कहा कि अब वे प्रशिक्षित योग शिक्षक ही नहीं, बल्कि भारत की सनातन चेतना के दूत बनकर विश्व में जाए। केवल आसन न सिखाएं, बल्कि प्रेम, करुणा, संतुलन, अनुशासन और आत्मजागरण का संदेश भी पहुंचाएं। मौके पर योगाचार्य साध्वी आभा सरस्वती, डॉ इन्दु शर्मा, गंगा नन्दिनी, दासा दास, गायत्री, मंयक मौजूद रहे।

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