भाजपा नेता देबेन्द्र रॉय की मौत को ममता सरकार नहीं मानती राजनीतिक हत्या, सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर नई दिल्ली, एजेंसी । पश्चिम बंगाल की ममता सरकार ने राज्य के भाजपा नेता देबेन्द्र रॉय की मौत को राजनीतिक हत्या मानने से इनकार कर दिया है। रॉय की मौत की सीबीआई जांच की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर जवाबी हलफनामे में राज्य सरकार ने कहा कि मामले की सीआईडी जांच कराई गई थी और सक्षम अदालत में आरोप पत्र दायर किया जा चुका है। बता दें, रय का शव पिछले साल जुलाई में उनके घर के पास ही लटका मिला था। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में रॉय की मौत को ‘राजनीतिक हत्या‘ बताते हुए इसकी सीबीआई जांच कराने का आग्रह किया गया है। पश्चिम बंगाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के जवाब में दायर हलफनामे में कहा है कि प्रदेश की सीआईडी ने सभी पहलुओं की जांच की और मौत के कारणों का पता लगाया है। इस संबंध में सक्षम अदालत में आरोप पत्र भी दाखिल कर दिया गया है। राज्य सरकार की ओर से मालदा जोन के सीआईडी के पुलिस उपाधीक्षक द्वारा दाखिल हलफनामे में इस बात से इनकार किया गया कि देबेन्द्र नाथ रय की मौत एक राजनीतिक हत्या थी या इसमें सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल किया गया या इसमें उसकी किसी भी तरह की भूमिका थी। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति अशोक भूषण, न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी और न्यायमूर्ति एम आर शाह की पीठ के समक्ष मंगलवार को यह मामला सुनवाई के लिए सूचीबद्घ था। याचिकाकर्ता शशांक शेखर झा और सैवियो रोड्रिग्स ने बंगाल सरकार के हलफनामे पर अपना प्रत्युत्तर दाखिल करने के लिए समय देने का पीठ से अनुरोध किया। इस पर पीठ ने मामले को दो सप्ताह बाद सूचीबद्घ करने का निर्देश दिया। रॉय का शव 13 जुलाई 2020 को उनके घर के निकट ही उत्तरी दिनाजपुर जिले के हेमताबाद में लटका मिला था। वह 2016 में मार्क्सवादी पार्टी के टिकट पर पश्चिम बंगाल विधान सभा के विधायक निर्वाचित हुए थे। 2019 में वह भाजपा में शामिल हो गए थे। राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से याचिका खारिज करने का अनुरोध करते हुए याचिकाकर्ताओं के इन आरोपों को झूठा और निराधार करार दिया है कि देबेन्द्र नाथ रय की पहले हत्या की गई और इसके बाद उनका शव लटका दिया गया। हलफनामे में कहा गया है कि मृतक की पत्नी ने इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपने का अनुरोध करते हुए कलकत्ता उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी, लेकिन उच्च न्यायालय ने यह याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि उसे जांच एजेंसी के काम में किसी प्रकार का दुराग्रह नजर नहीं आया।

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भाजपा नेता देबेन्द्र रॉय की मौत को ममता सरकार नहीं मानती राजनीतिक हत्या, सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर
नई दिल्ली, एजेंसी । पश्चिम बंगाल की ममता सरकार ने राज्य के भाजपा नेता देबेन्द्र रॉय की मौत को राजनीतिक हत्या मानने से इनकार कर दिया है। रॉय की मौत की सीबीआई जांच की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर जवाबी हलफनामे में राज्य सरकार ने कहा कि मामले की सीआईडी जांच कराई गई थी और सक्षम अदालत में आरोप पत्र दायर किया जा चुका है।
बता दें, रय का शव पिछले साल जुलाई में उनके घर के पास ही लटका मिला था। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में रॉय की मौत को ‘राजनीतिक हत्या‘ बताते हुए इसकी सीबीआई जांच कराने का आग्रह किया गया है।
पश्चिम बंगाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के जवाब में दायर हलफनामे में कहा है कि प्रदेश की सीआईडी ने सभी पहलुओं की जांच की और मौत के कारणों का पता लगाया है। इस संबंध में सक्षम अदालत में आरोप पत्र भी दाखिल कर दिया गया है। राज्य सरकार की ओर से मालदा जोन के सीआईडी के पुलिस उपाधीक्षक द्वारा दाखिल हलफनामे में इस बात से इनकार किया गया कि देबेन्द्र नाथ रय की मौत एक राजनीतिक हत्या थी या इसमें सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल किया गया या इसमें उसकी किसी भी तरह की भूमिका थी।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति अशोक भूषण, न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी और न्यायमूर्ति एम आर शाह की पीठ के समक्ष मंगलवार को यह मामला सुनवाई के लिए सूचीबद्घ था। याचिकाकर्ता शशांक शेखर झा और सैवियो रोड्रिग्स ने बंगाल सरकार के हलफनामे पर अपना प्रत्युत्तर दाखिल करने के लिए समय देने का पीठ से अनुरोध किया। इस पर पीठ ने मामले को दो सप्ताह बाद सूचीबद्घ करने का निर्देश दिया।
रॉय का शव 13 जुलाई 2020 को उनके घर के निकट ही उत्तरी दिनाजपुर जिले के हेमताबाद में लटका मिला था। वह 2016 में मार्क्सवादी पार्टी के टिकट पर पश्चिम बंगाल विधान सभा के विधायक निर्वाचित हुए थे। 2019 में वह भाजपा में शामिल हो गए थे।
राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से याचिका खारिज करने का अनुरोध करते हुए याचिकाकर्ताओं के इन आरोपों को झूठा और निराधार करार दिया है कि देबेन्द्र नाथ रय की पहले हत्या की गई और इसके बाद उनका शव लटका दिया गया। हलफनामे में कहा गया है कि मृतक की पत्नी ने इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपने का अनुरोध करते हुए कलकत्ता उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी, लेकिन उच्च न्यायालय ने यह याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि उसे जांच एजेंसी के काम में किसी प्रकार का दुराग्रह नजर नहीं आया।

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